खुदीराम बोस जीवनी: स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस जन्मदिन विशेष [Updated- 2022]

खुदीराम बोस जीवनी

नमस्कार दोस्तों, आज का यह लेख हमारे देश के महान स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस को समर्पित है। इस पोस्ट में हम खुदीराम बोस के जीवन परिचय, उनके द्वारा किये गए साहसिक कार्यों और उनके द्वारा कहे गए कथनों के बारें में जानेंगे। आप इस पोस्ट को पढने के बाद अपनी प्रतिक्रिया जरुर दीजियेगा। अगर आप हिंदी लेखों के पढ़ने के शौक़ीन हैं तो आप “अनमोलसोच डॉट इन” का बिलकुल मुफ्त ईमेल सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं। 

खुदीराम बोस जीवनी: स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस जन्मदिन विशेष
खुदीराम बोस जीवनी: स्वतंत्रता सेनानी खुदीराम बोस जन्मदिन विशेष

बहुत से ऐसे इतिहासकारों का ऐसा मानना है की खुदीराम बोस देश के आजादी के लिए फांसी पर चढ़ने वाले पहले सबसे कम उम्र के युवा क्रन्तिकारी थे। लेकिन यह अवधारणा गलत है। इनसे पहले 17 जनवरी 1872 को 68 कुकाओं के नरसंहार के वक्त 13 वर्ष का एक बालक भी शहीद हुआ था। कुछ इतिहासकारों का कहना है की जैसे ही उस बालक को तोप के सामने लाया गया तो उसने लुधियाना के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर कावन की दाढ़ी कसकर पकड़ लिया और तब तक नहीं छोड़ा जब तक उसके दोनों हाथ कट नहीं गयी।

बाद में उसी तलवार से 13 वर्ष के सबसे युवा क्रन्तिकारी बालक को मौत के घाट उतार दिया गया। अब आगे हम विस्तार से खुदीराम बोस के साहसिक कार्यों के बारें में जानेंगे।

1.0 खुदीराम के जन्म के बारें में 

खुदीराम का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गाँव में कायस्थ परिवार में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस के यहाँ हुआ था। उनकी माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। बालक खुदीराम के मन में देश को आजाद कराने की ऐसी लगन लगी कि नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आन्दोलन में कूद पड़े। छात्र जीवन से ही ऐसी लगन मन में लिये इस नौजवान ने हिन्दुस्तान पर अत्याचारी सत्ता चलाने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करने के संकल्प में अलौकिक धैर्य का परिचय देते हुए पहला बम फेंका और मात्र 19 वें वर्ष में हाथ में भगवद गीता लेकर हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे पर चढ़कर इतिहास रच दिया।

1.1 क्रांति के क्षेत्र में योगदान

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क्रांति के क्षेत्र में भी खुदीराम बोस का बड़ा ही सराहनीय योगदान रहा। स्कूल की पढाई छोड़ने के बाद खुदीराम बोस क्रन्तिकारी पार्टी के सदस्य बने और वंदेमातरम् पम्पलेट बाटने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी। सन 1905 में बंगाल के विभाजन यानि बंग-भंग के विरोध में चलाये गए आन्दोलन में भी उन्होंने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।  

1.2 अंग्रेजी अत्याचारियों पर गिराया पहला बम

30 अप्रैल 1908 को ये नियोजित काम के लिये बाहर निकले और किंग्जफोर्ड के बँगले के बाहर घोड़ागाड़ी से उसके आने की राह देखने लगे। बँगले की निगरानी के लिए वहाँ मौजूद पुलिस के गुप्तचरों ने उन्हें हटाना भी चाहा लेकिन वे वहीँ डंटे रहे हटे नहीं। रात में साढ़े आठ बजे के आसपास क्लब से किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान दिखने वाली गाडी आते हुए देखकर खुदीराम गाडी के पीछे भागने लगे। रास्ते में बहुत ही अँधेरा था। गाडी किंग्जफोर्ड के बँगले के सामने आते ही खुदीराम ने अँधेरे में ही आगे वाली बग्घी पर निशाना लगाकर जोर से बम फेंका।

हिन्दुस्तान में इस पहले बम विस्फोट की आवाज उस रात तीन मील तक सुनाई दी और कुछ दिनों बाद तो उसकी आवाज इंग्लैंड तथा योरोप में भी सुनी गयी जब वहाँ इस घटना की खबर ने तहलका मचा दिया। यूँ तो खुदीराम ने किंग्जफोर्ड की गाड़ी समझकर बम फेंका था परन्तु उस दिन किंग्जफोर्ड थोड़ी देर से क्लब से बाहर आने के कारण बच गया। दैवयोग से गाडियाँ एक जैसी होने के कारण दो यूरोपीय स्त्रियों को अपने प्राण गँवाने पड़े। खुदीराम बोस रातों-रात नंगे पैर भागते हुए गये और 24 मील दूर स्थित वैनी रेलवे स्टेशन पर जाकर विश्राम किया।

1.3 खुदीराम बोस की गिरफ्तारी

अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लग गयी और वैनी रेलवे स्टेशन पर उन्हें घेर लिया और खुदीराम बोस पकड़े गये। 11 अगस्त 1908 को उन्हें मुजफ्फरपुर (बिहार) जेल में फाँसी दे दी गयी। उस समय उनकी उम्र मात्र 18 वर्ष थी।

1.4 खुदीराम बोस शेर के बच्चे की तरह हंसते-हंसते चढ़ गये फांसी पर

मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख्ते की ओर बढ़े थे। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 18 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक खास किस्म की धोती बुनने लगे।

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उनकी शहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी। उनके साहसिक योगदान को अमर करने के लिए गीत रचे गए और उनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ। उनके सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं।

1.5 खुदीराम बोस के याद में जुलाहे ने किया ये काम

फाँसी के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गये कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे। इतिहासवेत्ता शिरोल के अनुसार बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिये वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल कालेज सभी बन्द रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे, जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।


चेहरे पर पर मुस्कान के साथ खुदीराम बोस ने कहा कि:- 

“मेरे जाने के बाद हज़ारों खुदीराम जन्म लेंगे”


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