संजय गाँधी जीवन परिचय | Biography of Sanjay Gandhi In Hindi [Updated- 2022]

संजय गाँधी जीवन परिचय | Biography of Sanjay Gandhi In Hindi

संजय गाँधी जीवन परिचय | Biography of Sanjay Gandhi In Hindi
संजय गाँधी जीवन परिचय | Biography of Sanjay Gandhi In Hindi

 

नमस्कार पाठकों, आज के इस (संजय गाँधी जीवन परिचय) लेख में हम संजय गाँधी से जुड़े सभी खास और रोचक जानकारियों को प्राप्त करेंगे। आज के इस लेख में हम इनके प्रारंभिक जीवन, शिक्षा , पारिवारिक जानकारी, राजनितिक कैरीएर जैसे खास जानकारियों को परोसेंगे। अगर आप हिंदी भाषी हैं और पढना आपकी हॉबी है तो आप “अनमोलसोच डॉट इन” का बिलकुल मुफ्त ईमेल सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं। इसके अलावा आप टेलीग्राम यूजर हैं तो आप इस पोस्ट के अंत में दिए गए लिंक से हमारे टेलीग्राम चैनल से जुड़ सकते हैं और सभी नए लेखों की जानकारी और सुविचार प्राप्त कर सकते हैं।

इस लेख के ये हैं कुछ खास बिंदु जिसपर हम चर्चा करेंगे:

  • संजय गाँधी का जन्म और प्रारंभिक जीवन
  • संजय गाँधी के कितने बच्चे हैं?
  • संजय गाँधी के पत्नी का नाम
  • संजय गाँधी का सबसे बड़ा शौक क्या था?
  • संजय गाँधी की राजनितिक सफ़र
  • संजय गाँधी की मृत्यु कब और कैसे हुई?
  • संजय गाँधी से जुड़े रोचक तथ्य

संजय गाँधी का जन्म और प्रारंभिक जीवन:-

राजनेता संजय गाँधी का जन्म 14 दिसम्बर 1946 को भारत की राजधानी दिल्ली में हुआ था। छोटे उम्र से ही जिद्दी स्वभाव के थे, जो ठान लेते थे वही करते थे और यहीं वजह उनके मौत की कारन बन गयी।  संजय को पढाई-लिखाई में बिलकुल भी मन नहीं लगता था। पहले वेल्हम बॉयज स्कूल और फिर ख्यातिप्राप्त देहरादून के दून स्कूल में उनका नामांकन कराया गया।

परन्तु इंदिरा और फ़िरोज़ गाँधी के तमाम प्रयासों के बावजूद वह स्कूल की पढाई भी पूरी नहीं कर पाए। अकादमिक योग्यता न होने के बावजूद वह ऑटोमोबाइल इंजीनियर बनना चाहते थे। इसके पीछे उनकी कारों के प्रति दीवानगी थी। ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में अपना करियर बनाने की चाहत में संजय ने इंग्लैंड का रुख किया और वहां प्रसिद्ध कार निर्माता कंपनी रोल्स-रोयस के साथ तीन वर्षों तक इंटर्नशिप किया।

फिर वह भारत वापस चले आये और हवाई जहाज का पायलट बनने की ट्रेनिंग लेकर कमर्शियल पायलट का लाइसेंस हासिल किया। लेकिन हवाई जहाज उड़ाना संजय गाँधी का अंतिम मुकाम नहीं था, उनकी महत्वाकांक्षा तो किसी और उड़ान को लेकर थी और वह थी राजनीति।

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संजय गाँधी के कितने बच्चे हैं:-

संजय गाँधी के सिर्फ बेटे हैं, जिनका नाम वरुण गाँधी हैं। जो राजनीती से सम्बन्ध रखे हैं। और इनका जन्म 13 मैच 1980 को भारत के नई दिल्ली में हुआ था। वरुण गाँधी के पत्नी या जीवन संगिनी का नाम यामिनी गाँधी है। ये राजनीती में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए है।

संजय गाँधी के पत्नी का नाम:-

संजय गाँधी की जीवन संगिनी मेनका गाँधी हैं जो भारत की प्रसिद्ध राजनेत्री एवं पशु-अधिकारवादी हैं। पूर्व में वे पत्रकार भी रह चुकी हैं। किन्तु भारत की प्रथम महिला प्रधान मंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र स्व॰ संजय गांधी की पत्नी के रूप में वे अधिक विख्यात हैं। उन्होने अनेकों पुस्तकों की रचना की है तथा उनके लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रायः आते रहते हैं।

संजय गाँधी का सबसे बड़ा शौक क्या था:-

संजय गाँधी का सबसे बड़ा शौक विमान उड़ाना था, और इसी वजह से इंग्लैंड से भारत वापस चले आये और हवाई जहाज का पायलट बनने की ट्रेनिंग लेकर कमर्शियल पायलट का लाइसेंस हासिल किया।

संजय गाँधी की राजनितिक सफ़र:-

यह कहना गलत नहीं होगा कि संजय गाँधी का युग भारतीय राजनीति में परिवर्तन का युग था। आज़ादी के बाद देश की सपाट चलती राजनीति में उन्होंने उथल-पुथल मचा दिया और देश पर एकक्षत्र राज करती आ रही कांग्रेस पार्टी को देश की आम जनता का आक्रोश झेलना पड़ा था। वर्ष 1974 तक संजय के पास राजनीति में करने के लिए कुछ खास नहीं था।

परन्तु इसी वर्ष जब देश में सरकार के विरुद्ध एकजुट विपक्ष ने देशव्यापी हड़ताल, विरोध-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू किया तो इससे न केवल इंदिरा सरकार को झटका लगा बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी हिचकोले आने शुरू हो गए। इतना ही नहीं इंदिरा सरकार को एक बड़ा झटका तब लगा, जब 25 जून 1975 को सरकार के काम-काज पर कोर्ट ने एक कड़ी टिप्पणी की और सरकार असहज हो गई।

यह कहना गलत नहीं होगा कि संजय गाँधी का युग भारतीय राजनीति में परिवर्तन का युग था। आज़ादी के बाद देश की सपाट चलती राजनीति में उन्होंने उथल-पुथल मचा दिया और देश पर एकक्षत्र राज करती आ रही कांग्रेस पार्टी को देश की आम जनता का आक्रोश झेलना पड़ा था। वर्ष 1974 तक संजय के पास राजनीति में करने के लिए कुछ खास नहीं था।

परन्तु इसी वर्ष जब देश में सरकार के विरुद्ध एकजुट विपक्ष ने देशव्यापी हड़ताल, विरोध-प्रदर्शन का सिलसिला शुरू किया तो इससे न केवल इंदिरा सरकार को झटका लगा बल्कि देश की अर्थव्यवस्था में भी हिचकोले आने शुरू हो गए। इतना ही नहीं इंदिरा सरकार को एक बड़ा झटका तब लगा, जब 25 जून 1975 को सरकार के काम-काज पर कोर्ट ने एक कड़ी टिप्पणी की और सरकार असहज हो गई।

उल्लेखनीय है कि संजय गाँधी न तो निर्वाचित प्रतिनिधि थे और न ही वे किसी संवैधानिक व प्रशासनिक पद पर थे, इसके बावजूद इंदिरा गाँधी सरकार में उनका भारी दखल था। सरकार के कैबिनेट मंत्री से लेकर उच्च प्रशासनिक अधिकारीयों और पुलिस महकमे तक पर उनका आदेश मानने का दबाव रहता था। परिणामस्वरूप कई कैबिनेट मंत्रियों और अधिकारीयों ने संजय कि दखलंदाजी से आजिज आकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

इंदिरा सरकार के तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल का कैबिनेट से इस्तीफे की वजह संजय गाँधी का उनके मंत्रालय में बढ़ती दखलंदाजी का ही परिणाम था। गुजराल के इस्तीफे के बाद संजय ने अपनी टीम के सदस्य विद्या चरण शुक्ल को सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया था। संजय के लिए सरकार का यह मंत्रालय सबसे अहम् था क्योंकि संचार माध्यमों जैसे आकाशवाणी और समाचार पत्रों पर आपातकाल के दौरान नकेल कसने के लिए यहीं से आदेश जारी होते थे। इसके बाद संजय ने संचार माध्यमों पर जिस प्रकार से नकेल कसा उसे आज भी आपातकाल के एक तुगलकी आदेशों के तौर पर याद किया जाता है।

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अंततः भारी विरोधाभासों और देश में कांग्रेस विरोधी माहौल बनने के कारण 1977 में देश में आपातकाल का दौर खत्म हुआ और चुनाव कराने की घोषणा हुई। संजय गाँधी भी उत्तर प्रदेश के अमेठी निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार चुनाव मैदान में उतरे. इस चुनाव में न सिर्फ इंदिरा और संजय की हार हुई बल्कि कांग्रेस को भी भारी पराजय का सामना करना पड़ा। यह हार संजय के लिए एक चुनौती बन गया। वह नए सिरे से अपनी राजनीतिक बिसात बिछाने में लग गए

संजय गाँधी से जुड़े रोचक तथ्य:-

  • संजय हमेशा से ही कारों और हवाई जहाजों में दिलचस्पी रखते थे।
  • उन्होंने किसी भी कॉलेज में दाखिला नहीं लिया, क्योंकि वह अपना करियर ऑटोमोबाइल क्षेत्र में बनाना चाहते थे। जिसके चलते उन्होंने इंग्लैंड के Rolls-Royce Crewe में एक प्रशिक्षु के रूप में कार्य किया।
  • एक कुशल राजनीतिज्ञ के अलावा वह एक प्रशिक्षित पायलट भी थे।
  • संजय ने मेनका गांधी से विवाह किया, जो उनके मुकाबले 10 साल छोटी थी।

 

  • जब वर्ष 1975 में अमृत नाहटा द्वारा निर्देशित फिल्म “किस्सा कुर्सी का” (जो कि इंदिरा गांधी और संजय गांधी के ऊपर एक कटाक्ष थी) को सेंसर बोर्ड़ के पास सत्यापन हेतू भेजा गया, तो बोर्ड ने फिल्म को सात सदस्यीय संशोधन समिति में स्थानांतरित कर दिया और उसके बाद फिल्म को सरकार के पास भेजा गया। इसके उपरांत फिल्म में सरकार द्वारा 51 आपत्तियां दर्ज की गईं। जवाब में, निर्देशक ने कहा कि पात्र काल्पनिक हैं और यह किसी की भावनाओं को चोट नहीं पहुँचाते हैं। जिसके चलते गुड़गांव में मारुति के कारखाने में फिल्म के सभी प्रिंट और मास्टर प्रिंट जला दिए गए।

 

  • वर्ष 1997 में भारत सरकार द्वारा स्थापित एक समिति ने संजय गांधी और तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री वी. सी. शुक्ला को दोषी पाया था। फरवरी 1979 में संजय और शुक्ला को क्रमशः एक महीने और दो साल की कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसमें उन्हें जमानत नहीं दी गई। बाद में, यह फैसला ख़ारिज कर दिया गया।
  • मार्च 1977 में, वह बाल-बाल बचे, जब वह चुनाव के लिए प्रचार कर रहे थे, कि अचानक एक अज्ञात बंदूकधारी ने दक्षिण-पूर्व दिल्ली के पास उनकी कार पर गोलीबारी करनी शुरू कर दी।
  • जून 1980 में, जब वह दिल्ली फ्लाइंग क्लब के द्वारा एक नए विमान की यात्रा कर रहे थे, तब उनके विमान का संतुलन बिगड़ गया और उन्होंने अपना नियंत्रण खो दिया। जिसके चलते विमान हवा में ही क्षतिग्रस्त हो गया और उनकी मृत्यु हो गई।

 

  • ऐसा माना जाता था कि इंदिरा गांधी के बाद संजय गांधी ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उत्तराधिकारी होंगे, परन्तु एक घातक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गईं, जिसके चलते उनके भाई राजीव गांधी को पार्टी का भावी उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया।
  • संजय की मृत्यु के तुरंत बाद, मेनका गांधी, उनकी 23 वर्षीय विधवा और उनके पुत्र वरुण को प्रधानमंत्री के घर से बेदखल कर दिया गया। जिसके चलते मेनका ने बाद में अपनी स्वयं की राजनीतिक पार्टी “संजय विचार मंच” का गठन किया, जिसने कई गैर-कांग्रेस विरोधी सरकारों में भी कार्य किया। उसके बाद वह अपने पुत्र के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए।

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संजय गाँधी की मृत्यु कब और कैसे हुई:-

संजय गाँधी हवाई जहाज उड़ाने के शौक़ीन थे। 23 जून 1980 को वह दिल्ली के सफदरजंग एयरपोर्ट पर दिल्ली फ्लाइंग क्लब के नए जहाज को उड़ा रहे थे। जहाज को हवा में कलाबाजी दिखाने के दौरान वे नियंत्रण खो बैठे और जहाज दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस दुर्घटना में वह अकाल मृत्यु के शिकार हो गए.

संजय की मृत्यु से तीन महीने पूर्व मेनका ने एक बच्चे को जन्म दिया था जिसका नाम उन्होंने वरुण गाँधी रखा। संजय की मृत्यु के पश्चात गाँधी परिवार में इंदिरा और मेनका के बीच विवादों का दौर शुरू हो गया। अंततः 1981 में मेनका अपने बेटे वरुण के साथ हमेशा के लिए गाँधी परिवार से अलग हो गईं। आज माँ-बेटा दोनों राजनीति में हैं और भारतीय जनता पार्टी के सांसद हैं।


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