चरित्र- एक कहानी इतिहास के पन्ने से

चरित्र- एक कहानी इतिहास के पन्ने से

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“चरित्र गया तो सबकुछ गया”– यह कहावत अक्सर हम सुनते हैं। लेकिन चरित्र शब्द को समझने में अक्सर हमसे भूल होती है। स्त्री-पुरुष के आपसी संबंधों के संदर्भ में ही अक्सर इस शब्द की चर्चा की जाती है, जबकि यह शब्द संपूर्ण मानवीय मूल्यों की ओर संकेत करता है।
चरित्र को ही कुछ मनुष्यों ने जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि बताया है। क्योंकि परमात्मा भी उसी को अपनाता है, जिसमें सद्गुण होते हैं— दुश्चरित्र का मैं वरण नहीं करता। निर्मलता को भी। ‘चरित्र’ की परिभाषा माना जा सकता है। इस संदर्भ में इतिहास के पन्नों पर मिलने वाली एक घटना अत्यंत महत्वपूर्ण है
अपने अहंकार में चूर तैमूरलंग भूभाग को रौंदता हुआ जब तुर्किस्तान पहुंचा तो बहुत से गुलाम पकड़कर उसके सामने लाए गए। तुर्किस्तान का विख्यात कवि अहमदी भी दुर्भाग्य से पकड़ा गया। जब वह तैमूर के सामने उपस्थित हुआ, तो एक व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए उसने दो गुलामों की ओर इशारा किया और पूछा, ” सुना है कि कवि बड़े पारखी होते हैं, बता सकते हो, इनकी कीमत क्या होगी ?”
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“इनमें से कोई भी 4 हजार अशर्फियों से कम कीमत का नहीं है।” अहमदी ने सरल, किन्तु स्पष्ट उत्तर दिया।
“मेरी कीमत क्या होगी?” तैमूर ने अभिमान से अगला सवाल पूछा। “यही कोई 24 अशर्फी।” निश्चिंत भाव से अहमदी ने उत्तर दिया।
तैमूर क्रोध से आग बबूला हो गया। वह चिल्लाया, “गुस्ताख! इतने में तो मेरी सदरी भी नहीं बन सकती, तू यह कैसे कह सकता है कि मेरा मूल्य कुल 24 अशर्फी है ?”
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अहमदी ने बिना किसी आवेश या उत्तेजना के उत्तर दिया, “बस, यह कीमत | उसी सदरी की है, आपकी तो कुछ भी कीमत नहीं है। जो मनुष्य पीड़ितों की सेवा नहीं कर सकता, बड़ा होकर छोटों की रक्षा नहीं कर सकता, असहायों की, अनाथों की जो सेवा नहीं कर सकता, मनुष्य से बढ़कर जिसे अहमियत प्यारी हो, उस इंसान का मूल्य चार कौड़ी भी नहीं, उससे अच्छे तो ये गुलाम ही हैं, जो किसी के काम तो आते हैं।”
इसलिए ‘चरित्र गया, तो सबकुछ गया’ इस उक्ति के रहस्य को जान समझकर चरित्र का निर्माण कीजिए। ‘चरित्र निर्माण’ का पाठ किसी खास उम्र तक या किसी खास उम्र वालों के लिए ही नहीं हुआ करता है। यह तो एक सतत प्रक्रिया है- जन्म जन्मांतरों की प्रक्रिया।
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चरित्रवान में कवि की कल्पना होती है, एक योद्धा सा जुझारूपन होता है, संतों-सी क्षमा और करुणा होती है, ऋषि-सा स्पष्ट चिंतन होता है, न्यायाधीश-सी निष्पक्षता होती है, पंछियों-सी चहक होती है और होती है फूलों सी महक ।
चरित्रवान ऐसी चट्टान की तरह होता है, जिसका तेज-से-तेज हवाएं कुछ नहीं बिगाड़ पातीं, बल्कि उससे टकराकर वे अशक्त हो जाती हैं। तेज से तेज लहरें उसको बहा नहीं पातीं, बल्कि तराशती हैं उसे, और वह चमक उठता है अनमोल हीरे की तरह, जिसे देखकर लोगों के मुख से सहजरूप से वाहवाही ही निकलती है।
चरित्रवान से संसार के लोग ही नहीं, स्वयं भगवान भी प्यार करते हैं। क्योंकि संसार के प्रलोभनों से स्वयं को बचाकर ले जाना साधारण व्यक्ति का काम नहीं होता, देवता भी कहां संभाल पाते हैं अपना चरित्र, इसीलिए चरित्रवान व्यक्ति देवताओं द्वारा भी पूजा जाता है।


साथ जब छोड़ जाते हैं साथी,
खूबियां अंग-संग चलती हैं


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