कर्म पर विभिन्न महापुरुषों के अपने-अपने विचार

कर्म पर विभिन्न महापुरुषों के अपने-अपने विचार

नमस्कार पाठकों, आज मैं आप सब के लिए कर्म पर आधारित विभिन्न महापुरुषों के अपने-अपने विचार लेकर आया हूँ। अगर आप पढने के शौक़ीन हैं तो आप बिलकुल सही जगह पर हैं। हर रोज आप इस वेबसाइट पर कुछ न कुछ नया जरुर सीखेंगे. आप यहाँ सभी तरह के हिंदी लेखों को पढ़ सकते हैं। फ़िलहाल अभी चलिए हम कर्म पर आधारित सुविचारों का अध्ययन करते हैं। “कर्म पर विभिन्न महापुरुषों के अपने-अपने विचार”  इस लेख के अंत में अपनी प्रतिक्रिया जरुर दीजियेगा।

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  • जो व्यक्ति छोटे कर्मों को ईमानदारी से करता है, वही बड़े कामों को भी ईमानदारी से कर सकता है।

         – सैम्युअल स्माइल्स

  • जो कार्य जितनी श्रद्धा से किया जाएगा, उतना ही श्रेष्ठ होगा।

           – महात्मा बुद्ध

  • जो कर्म यज्ञ के लिए किए जाते हैं, उनके अलावा हुए कर्मों से बंधन उत्पन्न हो जाते हैं।

            -श्रीकृष्ण

  • कर्म की समाप्ति ज्ञान में और ज्ञान का अर्थ पूर्ण समर्पण में है।

           -अरविन्द घोष

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  • काम करके कुछ उपार्जन करना शर्म की बात नहीं। दूसरों का मुंह ताकना शर्म की बात है।

          -मुशी प्रेमचंद

  • कोई भी व्यक्ति किसी कार्य को सर्वोत्तम ढंग से करना चाहता है तो उसे अपनी संपूर्ण योग्यता पूरी सामर्थ्य उसमें लगा देनी चाहिए।

          -स्वेट मार्डेन

  • काम करने से पहले सोचना बुद्धिमानी, काम करते हुए सोचना सतर्कता और काम करने के बाद सोचना मूर्खता है।

          -दयानंद सरस्वती

  • कर्म जीवन में आनंद देता है और दुःखों को भूलने का साधन बनता है।

          -स्वामी रामतीर्थ

  • कोई भी व्यक्ति उस कार्य को कर सकता है, जिसे पहले कोई मनुष्य कर चुका है।

          -राजा ठाकुर

  • जो सिर्फ काम की बात करते हैं, वे अवश्य सफल होते हैं।

         -डेल कारनेगी


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  • कर्म दुखों का कारण होते हैं, लेकिन इनके बिना सुख भी नहीं मिलता।

         -डिजरायली

  • कर्म के दर्पण में व्यक्तित्व का प्रतिबिंब झलकता है।

        -दिनोबा भावे

  • कर्म करने पर ही तुम्हारा अधिकार है, फल में नहीं। तुम कर्मफल का कारण मत बनो और अपनी प्रवृत्ति कर्म करने में रखो।

        -श्रीमद्भगवद्गीता

  • कर्म का उद्देश्य ही नहीं कर्म भी सदा महत्वपूर्ण होता है।

         -जवाहर लाल नेहरू

  • कठोर श्रम की इच्छा एवं शक्ति का दूसरा नाम प्रतिभा है।

          -मैक आर्थर

  • किया हुआ पुरुषार्थ भाग्य का निर्माण करता है। साक्षात ईश्वर भी पुरुषार्थहीन व्यक्ति को कुछ देने के अधिकारी नहीं होते।

        -वेदव्यास

  • कार्य आरंभ न करने से उद्देश्य सिद्ध नहीं होता, परंतु पुरुषार्थ करने से भी जिनके कार्य सिद्ध न हों, वे भाग्य के मारे होते हैं।

        -वेदव्यास

  • कर्म के द्वारा मौन रहते हुए चींटी से अच्छा उपेदश कोई दूसरा नहीं देता।

        -डॉ. राधाकृष्णन


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  • कार्य यश से प्रेरित होकर नहीं करने चाहिए। 

        -प्लेनी

  • कार्यों की सिद्धि मनोरथ से नहीं उद्यम से होती है।

        -संस्कृत लोकोक्ति

  • कर्म निर्णायक है सुख और दुःख का। पाप कर्म से दुःख, शुभ कर्म से सुख प्राप्त होता है और न किया हुआ कर्म कोई फल नहीं देता।

        -वेदव्यास

  • किसी कार्य को आरंभ न करें, यह ज्यादा अच्छा है उससे जो कार्य आरंभ करके छोड़ दिया जाए। अतः कार्य आरंभ करने से पहले सब चीजें देख सोच लेनी चाहिए।

        -बोधि चर्या

  • किसी भी मनुष्य के कार्य एक पुस्तक की विषय सूची के समान हैं, जो बताते हैं कि उसके अंदर क्या अनोखी बातें हैं।

        -थॉमस

  • कार्य वह औषधि है जिससे इंसान अपनी व्याधि, दुःख और पीड़ा को भी भूल जाता है। कर्म ही आनंद है।

        -स्वामी रामतीर्थ

  • करने से पहले प्रत्येक कार्य असम्भव नजर आता है।

        -कार्लाइल

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  • कर्म करने से पहले यह तय कर लेना चाहिए कि उससे पछतावा होगा या प्रसन्नता प्राप्त होगी।

       -भगवान बुद्ध

  • कर्म के बिना सुख नहीं मिलता, लेकिन ध्यान रखें कर्म सदैव सुख नहीं लाते कुछ कर्म असफल भी हो जाते हैं।

        -डिजरायली

  • कर्म ही धर्म का दर्शन है। समय समय पर पुरातन दर्शन की नये संदर्भ में समय के अनुसार बुद्धिमत्तापूर्ण व्याख्या की आवश्यकता होती है। बुद्धिमान व्यक्ति, पैगंबर और ऋषि, जनसाधारण को पुरातन दर्शन को वर्तमान संदर्भ में ही अपनाने का परामर्श देते हैं।

       -स्वामी विवेकानंद

  • काम करने वाला मरने से कुछ घंटे पूर्व ही बूढ़ा होता है। 

        -वृन्दावनलाल वर्मा

  • कर्म से आदमी ऊंचा नीचा होता है। प्रभु सबको उसके कर्मफल से ऊंचा पद व मान मर्यादा देते हैं।

        -वेद व्यास

  • कोमलता से बोलो और मधुरता से मुस्कराओ।

       -एडीसन

  • कर्मफल का त्याग ही सच्चा त्याग है। यही मुक्ति है।

       -भगवान कृष्ण

  • कर्मयोगी भाग्य का निर्माण स्वयं करते हैं। कर्महीन ही भाग्य को कोसते हैं।

       -अनाम

  • किया हुआ कर्म और बोया हुआ बीज उचित समय लेता ही है।

       -मनुस्मृति

  • कर्मनिष्ठता से पुरुषार्थ उसी तरह देदीप्यमान होता है, जिस प्रकार अग्नि में तपने से कुंदन ।

      -आचार्य रामदेव

  • कोई व्यक्ति हमेशा दुःख नहीं भोग सकता। कोई भी व्यक्ति जीवन भर कष्ट में नहीं रहेगा। प्रत्येक कर्म का फल है और उसी अनुसार ही व्यक्ति सुख या दुःख भोगा करता है।

     -मां श्रद्धादेवी


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  • कर्मफल की इच्छा रखना कृपण का कार्य है।

      -गीता

  • कर्म की मुक्ति आनंद में एवं आनंद की मुक्ति कर्म में है।

     -रवींद्रनाथ ठाकुर

  • उत्तम पुरुषों की यह रीति है कि वे किसी भी कार्य को अधूरा नहीं छोड़ते।

      -गुरु नानकदेव

  • अच्छे कामों की सिद्धि में बड़ी देर लगती है, पर बुरे कामों की सिद्धि में यह बात नहीं होती।

      -प्रेमचंद

  • इस संसार में वही जीवित है जिसने यश एवं कीर्ति के कर्म किए।

       -अज्ञात

  • इस पृथ्वी पर साधन करने से सभी काम सफल होते हैं।

      -अज्ञात

  • आत्मा जिस कार्य को करने में सहमत न हो, उस कार्य को करने में शीघ्रता न करो। अधूरा काम और अपराजित शत्रु दोनों ही बिना बुझी चिंगारी के समान हैं।

      -चाणक्य

  • अपने कर्तव्य में प्रयत्नशील रहना और चुप रहना बदनामी से बचने का सबसे अच्छा तरीका है।

       -जॉर्ज वाशिंगटन

  • अपने उचित कर्म में लगे रहने से ही मानव को सिद्धि प्राप्त होती है।

       -श्रीमद्भगवद्गीता

  • अच्छे कार्य, जो छिप कर किए जाते हैं, सबसे अधिक आदर के पात्र हैं।

        -पास्कल

  • अपने से हो सके, वह काम दूसरे से नहीं करवाना चाहिए।

      -महात्मा गाँधी

  • मनुष्य को कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा रखनी चाहिए।

       -कठोपनिषद्

  • अधूरा काम और अपराजित शत्रु, ये दोनों बिना बुझी हुई चिनगारियों की तरह हैं।

      -तिरूवल्लुवर

  • अपने कार्य को पूरा करो और खरे बनकर पेट भरो। बलवान, क्रियाशील, कर्तव्यपरायण, ईमानदार और मेहनती व्यक्तियों को ही जीवन का सर्वोच्च आनंद प्राप्त होता है।

     -ऋग्वेद

  • यदि फल सामने रखकर कर्म करेंगे तो उस प्रसन्नता को खो देंगे जो फल प्राप्त होने पर उपजती है। अतः दीन हैं वे लोग, जो फल के कारण कार्य। करते हैं।

     -महाभारत

  • मनुष्य का उद्धार पुत्र पैदा करने में नहीं, कर्मों को पैदा करने में है। यश और कीर्ति कर्मों से प्राप्त होती है। संतान उस परीक्षा के समान है, जो ईश्वर ने मनुष्य को परखने के लिए ईजाद की है।

      -मुंशी प्रेमचंद

  • मनुष्य का कर्म ही उसके विचारों की सबसे अच्छी व्याख्या है।

      -लॉक 

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  • मानवता एवं स्वतंत्रता के शोषण के लिए पुजारियों ने भगवान का आविष्कार किया। ईश्वर से तात्पर्य प्रेम, करुणा, सेवा, सत्य एवं चिंतन है। मनुष्य के द्वारा ईश्वर की उपासना निपट मूर्खता है। जब वह कर्म से ईश्वर की सेवा करने में पूर्ण सक्षम है।

      -ओशो

  • मनुष्य को जीवन में सफल होना है। तो उसे प्रत्येक अवसर के लिए तैयार रहना चाहिए।

      -डिजरायली

  • मनुष्य को अपने कार्य का स्वामी बनना चाहिए, कार्य को अपना स्वामी नहीं बनने देना चाहिए।

     -अज्ञात

  • भक्तिशून्य कर्म अहंकार का प्रतीक है और भक्ति रहित उपासना दंभ का नामांतर है।

      -राजगोपालाचारी

  • भाग्य के आदेश को मानने की अपेक्षा उत्साहमय कर्मशील जीवन श्रेष्ठ है। भाग्य कर्मों का ही परिणाम है। निर्विरोध आत्म पराजय की अपेक्षा सत्कर्म ही श्रेयस्कर है।

        -दयानंद सरस्वती

  • बिना विश्वास और आस्था के कार्य करना ऐसे गड्ढे में पहुंचने का प्रयास है जिसका कोई तला ही नहीं।

      -महात्मा गाँधी

  •  मनुष्य जब असाधारण कार्य कर दिखाता है, वह यश का कारण बन जाता है।

       -कालिदास

  • प्रतिभावान वह कार्य करते हैं जिसे किए बिना वे रह नहीं सकते। गुणी व्यक्ति वह कार्य करते हैं, जो वे कर सकते हैं।

        -मेरीडेज

  • पापकर्म की याद जब व्यथित करे, तो ईश्वर का आदेश होता है कि नेककर्म करने की आवश्यकता है।

       -काकोडिया वाद

  • मनुष्यों के कर्म उनके विचारों के सर्वोत्तम व्याख्याता हैं।

      -जॉन लॉक

  • परस्पर विरोधी विचारों में एकता कराने से बढ़कर दुष्कर कर्म और नहीं है।

       -डिक्सन

  • प्रसन्न रहने के लिए तुम आत्मविस्मृत हो जाओ, परोपकारी बनो, दूषित विचार दूर करने का यही एक उपाय है।

     -वल्वर

  • प्रतिष्ठा आलसियों और अपाहिजों की तरह दूसरों के बल पर जीने में नहीं है, वह है स्वयं अपना कार्य करने में और पसीना बहाकर रोटी कमाने में।

      -महात्मा गाँधी

  • प्रत्येक काम को पूरी सावधानी से करो। किसी काम को छोटा। समझकर उसकी उपेक्षा मत करो।

      -बर्नाड शॉ

  • पहले किए हुए कर्मों के द्वारा आप अपने भाग्य को पा रहे हैं।

     -योगवशिष्ठ

  • जिसकी तुम आकांक्षा करते हो, यदि वह करना संभव नहीं, तो उसी की आकांक्षा करो जो तुम कर सकते हो। तुम जिसके योग्य हो।

      -महाभारत

  • धन्य है वह पुरुष जो कार्य करने से कभी पीछे नहीं हटता। भाग्य लक्ष्मी उसके घर की राह पूछती हुई आती है।

      -भगवान महावीर

  • जो व्यक्ति कार्य करते रहते हैं उनके •पास लक्ष्मी का वास उनके न चाहते हुए भी रहता है। वैसे ही जैसे समुद्र कोई कामना न रखकर भी अनेक नदियों का प्रसाद पाता है।

     -ऋग्वेद

  • जो स्वावलंबी व्यक्ति अपने कर्म के पालन में तत्पर रहता है, उसे ही सिद्धि मिलती है।

       -श्रीमद्भगवद्गीता

  • जो अपने सद्गुणों के आधार पर श्रेष्ठ कर्म करने का प्रयत्न करते हैं, उन्हें संसार में विद्या, धन और यश मिलता है।

       -ऋग्वेद

  • जो काम हाथ में लेना हो, उसमें पूरी श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा होने पर ही काम को मन और लगन से किया जा सकता है।

      -अज्ञात

  • हर समय किसी उपयोगी काम में लगे रहो।

      -लांगफेलो


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  •  स्वयं को कर्म के आधीन रखो। तुम्हारा अधिकार कर्म पर है और कर्मफल कर्मानुरूप प्राप्त होगा।

      -श्रीमद्भगवद्गीता

  • सज्जन की उपयोगिता कर्म से है, कण्ठ से नहीं।

      -श्री हर्ष

  • संयम की प्रकृति के समान निरंतर कर्म करने वाले कर्मनिष्ठ व्यक्तियों का नाम ही मानव समाज के इतिहास में दर्ज होता है।

       -चाणक्य

  • नापाक आदमी हर भले आदमी का दुश्मन होता है।

       -बीचर

  • सच्चा काम स्वार्थ और अहंकार को छोड़े बिना नहीं होता।

      -स्वामी रामतीर्थ

  • शूरजनों को अपने मुख से अपनी प्रशंसा करना कभी नहीं भाता। वे वाणी के द्वारा प्रदर्शन न करके शुभकर कर्म ही करते हैं।

     -वाल्मीकि

  • यह जानकर मैं सकते में आ गया कि सिर्फ अच्छे ईसाई ही स्वर्ग में जा सकते हैं इसलिये मैं पादरी नहीं बन सका, तब भी अच्छे कर्म तो करने ही हैं। मानव की भलाई की कामना तो करनी ही है, उसके लिए प्रयास करना ही है, वह मैं बिना पुजारी बने भी कर सकता हूं।

      -टेड टर्नर

  • प्रेम देवता का, क्षमा मनुष्य का और घृणा शैतान का कर्म है।

       -भर्तृहरि

  • सौ वर्ष जीने की इच्छा कर्म करते हुए ही की जा सकती है।

      -अज्ञात

  • प्रथम श्रेणी में वह मनुष्य जो बाधा के भय से कार्य शुरू नहीं करते, दूसरे वह मनुष्य जो काम तो शुरू करते हैं लेकिन बाधा पड़ने पर उसे अधूरा छोड़ देते हैं, तीसरे उत्तम पुरुष वे हैं जो कार्य शुरू करते हैं और हजार बाधाएं आने पर भी उसे पूर्ण करते हैं।

     -भर्तृहरि

  • शान किसी कार्य को कर डालने में नहीं अपितु उसे पूर्ण करने के प्रयास में है।

    -महात्मा गाँधी

  • शुभ कर्म के बिना हासिल किया ज्ञान पाप हो जाता है।

      -पोप

  • व्यर्थ कर्म भारीपन व थकान देते हैं, जबकि श्रेष्ठ कर्म हमें प्रसन्न व हल्का बनाकर ताजगी प्रदान करते हैं।

      -प्रेमचंद

  • विश्वास एवं लगन के बिना किया गया कार्य कागज के फूल की तरह है जिसमें कोई सुगन्ध नहीं होती।

     -महात्मा गांधी

  • यदि कोई मनुष्य किसी कार्य को अनिश्चितता से आरंभ करता है तो उसे दुविधा का सामना करना होगा और दुविधा से आरंभ करेगा तो अनिश्चितता में कार्य समाप्ति होगी।

      -फ्रांसिस बेकन

  • वही काम करना ठीक है जिसे करके पछताना न पड़े और जिसके फल को प्रसन्न मन से भोग सकें।

      -स्टेविस्ला लेक

  • जिस कार्य को तुम्हें हर प्रकार करना ही है, उसे मुस्करा कर करना ही सहकारिता है।

     -अज्ञात

  • पहले सब चीजे देखें फिर उचित निर्णय के साथ कार्य आरंभ करें। लेकिन आरंभ करके छोड़ देने के बजाय आरंभ न करना अच्छा।

      -आस्कर वाइल्ड

  • समतापूर्वक स्वयं आचरण करके लोगों में कर्म की रुचि पैदा करनी चाहिए।

      -अज्ञात

  • वासनाओं से अलग रहकर जो कर्म किया जाता है, वही सुकर्म है।

      -वृंदावनलाल वर्मा

  • कुएं में चाहे जितना पानी हो, चाहने भर से वह नहीं निकल आता।

     -कन्नड़ कहावत

  • किया हुआ पुरुषार्थ ही देव का अनुसरण करता है, किंतु पुरुषार्थ न करने पर देव किसी को कुछ नहीं दे सकता।

      -वेदव्यास

  • महान काम और महान बलिदान महान उपायों के बिना नहीं किए जा सकते।

      -महात्मा गाँधी

  • नर की सूची में वह व्यक्ति नहीं आते जिनमें देश के प्रति कर्तव्यशीलता नहीं।

     -मैथिलीशरण गुप्त

  • जिसमें समझदारी व कार्य शक्ति विशेष रूप से हो, वही प्रतिभावान है।

      -शार्पेनहवार

  • जो मनुष्य अपने कर्तव्य को अच्छी तरह करने की शिक्षा पा चुका है, वह मनुष्य से संबंध रखने वाले सभी कर्मों को भली-भांति करेगा।

      -रूसो

  • जब प्रकृति को कोई कार्य संपन्न कराना होता है, तो वह उसे करने के लिए प्रतिभा का निर्माण करती है।

     -इमर्सन

  • गहरा गोता लगाने वाले को ही मोती मिलता है।

     -बर्नाड शॉ

  • जब भाग्य अनुकूल रहता है, तब थोड़ा भी पुरुषार्थ सफल हो जाता है।

     -शुक्रनीति

  • जो धुरंधर महापुरुष आपत्ति में दुखी न होकर सावधानी के साथ उद्यम का आश्रय लेता है तथा समय पर दुख भी सहन कर लेता है, उसके शत्रु सदा पराजित होते हैं।

       -वेदव्यास

  • कर्म की सार्थकता फल में नहीं, कर्मण्यता में है, उस पुरुषार्थ में है जो एक-एक कदम की गति, एक एक कदम की चढ़ाई का आनन्द लेता है। चढ़ाई के प्रयत्न का सुख इतना मीठा है कि उसकी तृप्ति की कोई सीमा नहीं।

      -पं. जवाहरलाल नेहरू

  • जब हम कोई काम करने की इच्छा करते हैं, तो शक्ति आप ही आ जाती है।

      -अज्ञात

  • फल सदा भविष्य में है और कर्म सदा आज, अभी और यहीं। इसलिए जो कर्म में आनंद को प्राप्त नहीं करेगा वह फल से भी कभी संतुष्ट नहीं हो सकता।

      -ओशो


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